वो हुस्न-ए-हिजाब की एक मुरत है........ Hindi love poem.........

वो हुस्न-ए-हिजाब की एक मुरत है,
बड़ी दिलकश बड़ी ही खुबसूरत है.......!

होंठ उसके गुल की लाली से सजते,
गाल कंवल की रंगत से निखरते हैं.......!

सँवारने लगे जब वो अब-ए-आइने में,
उसकी आभा से आइना भी चमकता है.......!

जब बिखरती है जुल्फें उसकी सानो पे,
जैसे काली घटा जमी पर उतार आती है........!

महकने लगती है फिजा भी उसकी खूशबू से,
अपने तन पे जब वो इतर को छिड़कती है........!

झुम के निलके जब कुदरत के इन नजारों में,
उसके आने से पुरी कायनात खिल जाती है........!

अपनी नज्मों में उसके हुस्न को मैंने तराशा है,
पर उस रबने जन्नत की हूर को जमी पे उतारा है........!!

तेरा मेरा साथ रहे 👫
प्रभात......

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